Tuesday, 4 August 2015

मैं कवी नहीं हूँ

मैं कवी नहीं हूँ,
कभी कभी कुछ भाव, शब्दों के अभाव में,
टूटी फूटी पंक्तियों में कागज़ पर उतरते हैं,
तो वो कविता नहिं कहलाते...
वो भाव, वो शब्द मेरे साथ नहीं रहते,
कभी जाड़ों की रातों में यूँ ही रजाई की तरह मुझे घेर लेतें है,
या कभी भीड़ में भी जब एकांत से भेंट होती है, तब किसी पुराने साथी की तरह मेरा हाथ मिला लेतें हैं...
जी नहीं! मैं कवी नहीं हूँ...
मैं कवी नहीं हूँ,
मेरे भाव कोई चित्र नहीं कि ठहर जाएँ, कोई उन्हें समझ सके,
वे तो सिगरेट के धुंए की तरह है, जो नसों से दौड़ते हुए आते हैं और हवा में कहीं खो जाते हैं...
मेरे शब्द साधारण हैं, इनमे न कोई अलंकार है,
ना ही ये व्याकरण के फ़िल्टर से छन्न के आते हैं...
जी नहीं! मैं कवी नहीं हूँ...
मैं कवी नहीं हूँ,
मेरी पंक्तियाँ एक कथा बखान्ति है,
जिसका न सर है, न पैर; न दिशा है, न लक्ष्य...
जब भावों की स्कॉच अधड़ों से सीने को आग लगाती है,
तब लड़खड़ाती हुई कुछ पंक्तियां कागज़ पर उतर जाती है...
जी नहीं! मैं कवी नहीं हूँ...

Tuesday, 3 June 2014

बेखबर

चल निकला हूँ मैं उस सफ़र पर,
रास्ते अनजान जहाँ मंजिल बेखबर..
खो कर खुदको उस राह पर,
मैं कौन हूँ, खुदसे बेखबर...

ओढ़ लिया तुझको तन पर,
धुप-छाओं, मौसमों से बेखबर..
चढ़ गयी हाला सुध-बुद्ध पर,
मैं कौन हूँ, खुदसे बेखबर...

जोगी बन चला तेरे पंथ पर,
दोस्ती-रिश्तेदारी से बेखबर..
छाप तेरी ऐसी पड़ी रूह पर,
मैं कौन हूँ, खुदसे बेखबर...

Monday, 9 December 2013

बन बंजारा भटकू मैं

तू खींच तार सितार के,
तू राग बना मल्हार के, 
धुन में तेरी झुमुं मैं,
बन बंजारा भटकू मैं।

तू वन बसा चिर के,
तू उपवन खिला कश्मीर के,             
बन हिरन फिरूं मैं,
बन बंजारा भटकू मैं।

तू रंग उड़ा आकाश के,
तू चित्र बना पहाड़ के,
नीली धार बन उतरूं मैं,
बन बंजारा भटकू मैं।

तू मंदिर बना शिव के,
तू ताल बजा डमरू के,
बन जोगी तेरा नाचूं मैं,
बन बंजारा भटकू मैं।

Tuesday, 24 September 2013

दिल ढूँढता है...

मिसरा ग़ालिब का है, पर कैफियत सबकी अपनी अपनी...

दिल ढूँढता है... फिर वही... फुर्सत के रात दिन...
मोहले की चौक पर,
गेंद, बल्ले, गालियों से,
हम-उम्र साथियों संग,
घंटो जंग लड़ते हुए...
दिल ढूँढता है... फिर वही... फुर्सत के रात दिन...
या, भोर के सफ़र में,
पांच उन्चास के पालने पर,
हम-सफरों के संग,
रोज़ाना सोते हुए...
दिल ढूँढता है... फिर वही... फुर्सत के रात दिन...
या, कॉलेज की चौखट के आगे, 
मन्नू के टीले पर सिगरेट के बादलों से ऊपर,
सुट्टेरी पंछियों के संग,
सहसा उड़ते हुए...
दिल ढूँढता है... फिर वही... फुर्सत के रात दिन...
या, आधी रातों को,
आँगन के पेड़ तले चौकी पर,
सखों, साथियों, भूतों, कुत्तों के संग,
मक्खियाँ और गप्पे मारते हुए...
दिल ढूँढता है... फिर वही... फुर्सत के रात दिन...

Tuesday, 20 August 2013

कब तक

कब तक जमा खर्ची से काम चलेगा!?
कब तक बिना आय के खर्चा चलेगा!?
कब तक घर बेच कर घर चलेगा!?

कब तक भाई भाई को लड़ा कर परिवार चलेगा!?                  
कब तक खरीदी दोस्ती का मोह चलेगा!?
कब तक घर बेच कर घर चलेगा!?

कब तक तुम्हारा मौन व्रत चलेगा!?
कब तक स्वतंत्र भारत में दासत्व चलेगा!?
कब तक घर बेच कर घर चलेगा!?

कब तक माँ का शोषण चलेगा!?
कब तक शत्रुओं का पोषण चलेगा!?
अरे! कब तक घर बेच कर घर चलेगा!?

Wednesday, 24 July 2013

माँ

आज सुबह हमने बोसा किया खीर का,
पर माँ के हिस्से कल रात की बासी रोटी ही आई...
ये साजिश उसी की थी, पेट काट दिया खुदका,
मन रख लिया हम बच्चों का...

शहादत का अंजाम

क्या मिला इंक़लाब से?
क्या हुआ शहादत का अंजाम!?
तुम तो बैठे हो जन्नत में!
हमें छोड़ गए हिंदुस्तान!


- चोरी, चकारी, लूट, फसाद,
हत्या, कब्ज़ा, बलात्कार,
झूट, फरेब, भ्रष्टाचार,
सब है माफ़...
और इंक़लाब ही बना यहाँ कानून अपराध!!