Thursday, 4 July 2013

असमंजस

ज़िन्दगी किस चौराहे पर खड़ी है?
ख़बरदार है ज़माना, नोचने को तैयार है...
न मैं जानू किस ओर मंजिल है,
न वो जाने किस ओर महफ़िल है...
इस अँधेरे में एक राह की तलाश है,
न मेरे पास चराग है,
न उनके पास भी चराग है...


अब ख्वाबों की ज़िल्लत बर्दाश्त नहीं होती,
हकीक़त की बेबसी भी बर्दाश्त नहीं होती...
ज़ख्म ऐसे के भरे नहीं ज़मानो से,
और कभी रंजिशें भी रही ज़माने से...
मेरा ग़म तो दरिया है,
ये ज़माना भी तो दरिया है...

इस ओर देखे 'एकांती', वीराना है,
उस ओर, बहारों पे पर्दा लगा है...
असमंजस में है 'एकांती',
न बंजर धरा गवारा है,
न पर्दानशीं गुलिस्तां भी गवारा है...


ये सितम ऐसा ढाया खुद खुदा ने,
ख्वाइशें पूरी कर दी लापरवाही में...
चश्म-ऐ-नूर, हया, हुस्न बक्शा यार को,
फिर यार को ही बेगाना कर दिया...
माँगा जब सुकूं तब,
ज़िन्दगी को ही बेगाना कर दिया...
अब ग़िला, ग़म, मायूसी का आलम है,
चश्म-ऐ-तर पोंछती, सिसकती सहमती, घ़बरायी साकी बाला है...
पर अब यार पराया है,
और साकी भी तो पराया है...